दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) का बाजार एक निर्णायक मोड़ से गुजर रहा है। एक तरफ जहां पश्चिमी देशों में सख्त कार्बन उत्सर्जन नियमों के चलते इलेक्ट्रिक कारों की कीमतें घट रही हैं, वहीं दूसरी ओर भारत में मजबूत सरकारी समर्थन और बुनियादी ढांचे के विस्तार से ईवी सेक्टर से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में भारी उछाल देखने को मिल रहा है।
यूरोपीय बाजार में ईवी की कीमतों में बड़ी राहत
यूरोपीय संघ (ईयू) में पहली बार 2020 के बाद इलेक्ट्रिक कारों की औसत कीमत में गिरावट दर्ज की गई है। ट्रांसपोर्ट एंड एनवायरनमेंट (T&E) की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल ईवी की औसत कीमत 1,800 यूरो (करीब 4%) गिरकर 42,700 यूरो पर आ गई। कार निर्माता कंपनियों पर ईयू के कड़े कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों का भारी दबाव है और इसी से बचने के लिए उन्होंने बाजार में किफायती मॉडल उतारने शुरू कर दिए हैं।
यह गिरावट मुख्य रूप से बी-सेगमेंट के छोटे और सस्ते ईवी मॉडल्स के लॉन्च के कारण संभव हो पाई है, जिनकी कीमतों में 2025 में 13 प्रतिशत की कमी देखी गई। सिट्रोएन ई-सी3 और रेनॉल्ट 5 जैसे सस्ते मास-मार्केट मॉडल्स ने कंपनियों को ईयू के 2025 के कार्बन लक्ष्यों को पूरा करने में बहुत मदद की है। यह हालिया गिरावट इसलिए भी काफी अहम है क्योंकि 2020 से 2024 के बीच बैटरी और अन्य पुर्जों के सस्ते होने के बावजूद, कार निर्माताओं ने ज्यादा मुनाफे वाली बड़ी गाड़ियां बेचने पर ध्यान केंद्रित किया था। इसके परिणामस्वरूप उस दौरान औसत ईवी की कीमत में 5,000 यूरो का इजाफा हो गया था।
नीतियां बदलने का संभावित खतरा
T&E के कार निदेशक लुसियन मैथ्यू का स्पष्ट मानना है कि ईयू के सख्त लक्ष्य ही यूरोपीय चालकों को सस्ती इलेक्ट्रिक कारें दिला पा रहे हैं। विश्लेषण से पता चलता है कि आधे बाजार का प्रतिनिधित्व करने वाली कार कंपनियों ने 2025-2027 के लक्ष्य को दो साल पहले ही हासिल कर लिया है। रेनॉल्ट और फॉक्सवैगन जैसी कुछ कंपनियां अभी थोड़ी पीछे हैं, लेकिन उनके भी 2027 के अंत तक लक्ष्य तक पहुंचने की उम्मीद है। डी और ई सेगमेंट में इलेक्ट्रिक कारें 2024 में ही पेट्रोल-डीजल गाड़ियों की कीमत के बराबर (प्राइस पैरिटी) आ चुकी हैं। अनुमान है कि अगर लागत में कमी का फायदा ग्राहकों को मिलता रहा, तो ए, बी और सी सेगमेंट भी 2030 तक इस स्तर पर पहुंच जाएंगे।
मगर यूरोपीय आयोग द्वारा 2030 के कार्बन लक्ष्यों में ढील देने के प्रस्ताव ने एक नया जोखिम पैदा कर दिया है। यदि निर्माताओं को बड़े मार्जिन की छूट दी जाती है, तो 2030 में एक औसत ईवी मौजूदा लक्ष्य की तुलना में 2,300 यूरो अधिक महंगी हो सकती है। नियमों को तीन या पांच साल के औसत पर लागू करने की उद्योग जगत की मांग से बाजार में ईवी की हिस्सेदारी 57% से गिरकर क्रमशः 47% या 32% तक आ सकती है।
भारत में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर
यूरोप में जहां सारा ध्यान सस्ती कारों पर है, वहीं भारत में ईवी को अपनाने की रफ्तार तेज करने के लिए चार्जिंग के बुनियादी ढांचे को तेजी से मजबूत किया जा रहा है। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए बैंगलोर विद्युत आपूर्ति कंपनी (BESCOM) ने हाल ही में सर्वोटेक पावर सिस्टम लिमिटेड के साथ एक बड़ा अनुबंध किया है। इस समझौते के तहत सर्वोटेक पूरे कर्नाटक के 11 क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) परिसरों में डीसी फास्ट ईवी चार्जिंग स्टेशन स्थापित करेगा। इन सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशनों के चालू होने से राज्य के विभिन्न हिस्सों में ईवी मालिकों के लिए अपने वाहनों को चार्ज करना बेहद सुविधाजनक हो जाएगा।
3 रुपये से 175 रुपये तक का सफर
कर्नाटक से मिले इस बड़े ऑर्डर का सीधा असर शेयर बाजार में सर्वोटेक पावर सिस्टम के प्रदर्शन पर दिख रहा है। लगातार दूसरे दिन कंपनी के शेयरों में अपर सर्किट लगा। शुक्रवार को शेयर 162 रुपये के स्तर पर खुले थे, जो कुछ ही देर में 10 प्रतिशत की जोरदार बढ़त के साथ 173 के स्तर पर लॉक हो गए। इससे पहले गुरुवार और 10 दिसंबर को भी इन शेयरों में 10 और 5 फीसदी का शानदार उछाल दर्ज किया गया था।
निवेशकों के लिए यह एनर्जी स्टॉक एक सच्चा मल्टीबैगर साबित हुआ है। महज 2.70 रुपये के स्तर से उठकर यह शेयर आज अपने वर्तमान मुकाम तक पहुंचा है और पिछले तीन सालों में इसने 6,300 प्रतिशत से ज्यादा का रिकॉर्ड रिटर्न दिया है। आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले पांच दिनों में इसमें 25 प्रतिशत से अधिक, एक महीने में 35 प्रतिशत, छह महीने में 125 प्रतिशत और एक साल की अवधि में 131 प्रतिशत का भारी मुनाफा निवेशकों को हुआ है।
पीएम ई-ड्राइव पहल का व्यापक असर
सर्वोटेक जैसी बुनियादी ढांचा विकसित करने वाली कंपनियों के इस अभूतपूर्व विस्तार के पीछे भारत सरकार की मजबूत नीतियां काम कर रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू की गई ‘पीएम इलेक्ट्रिक ड्राइव रिवोल्यूशन इन इनोवेटिव व्हीकल एन्हांसमेंट’ (पीएम ई-ड्राइव) पहल का इसमें बहुत बड़ा योगदान है। इस योजना के तहत कुल 3,679 करोड़ रुपये की सब्सिडी और प्रोत्साहन राशि प्रदान की जा रही है, जिसका सीधा उद्देश्य भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाना है। बुनियादी ढांचे का यह विकास और सरकारी योजनाएं मिलकर भारतीय बाजार को पूरी तरह से बदल रही हैं।